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Wednesday, 14 July 2021

भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

  

KANISHKBIOSCIENCE E -LEARNING PLATFORM - आपको इस मुद्दे से परे सोचने में मदद करता है, लेकिन UPSC प्रीलिम्स और मेन्स परीक्षा के दृष्टिकोण से मुद्दे के लिए प्रासंगिक है। इस 'संकेत' प्रारूप में दिए गए ये लिंकेज आपके दिमाग में संभावित सवालों को उठाने में मदद करते हैं जो प्रत्येक वर्तमान घटना से उत्पन्न हो सकते हैं !


kbs  हर मुद्दे को उनकी स्थिर या सैद्धांतिक पृष्ठभूमि से जोड़ता है।   यह आपको किसी विषय का समग्र रूप से अध्ययन करने में मदद करता है और हर मौजूदा घटना में नए आयाम जोड़कर आपको विश्लेषणात्मक रूप से सोचने में मदद करता है।

 केएसएम का उद्देश्य प्राचीन गुरु - शिष्य परम्परा पद्धति में "भारतीय को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना" है। 

भारत में राज्यों के राज्यपाल


संदर्भ:

हाल ही में, राष्ट्रपति द्वारा 8 राज्यों में नए राज्यपालों की नियुक्ति की गयी है।

भारत में राज्यों के राज्यपाल (अनुच्छेद 152-162):

(Governors of States in India)

  • भारत में राज्यपाल, राज्य का नाममात्र प्रमुख होता है, जबकि मुख्यमंत्री, राज्य का वास्तविक प्रमुख होता है।
  • 7 वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम 1956 के अनुसार, एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है।
  • नियुक्ति: राज्यपाल तथा उप-राज्य्पाल्की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।

पदमुक्ति (Removal):

सामान्यतः राज्यपाल के पद का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है, किंतु इसे कार्यकाल की समाप्ति से पूर्व भी पद-मुक्त किया जा सकता है: राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यंत पद धारण करता है, तथा प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्टपति द्वारा पद से बर्खास्त किया जा सकता है।

राज्यपाल को पद से हटाने के लिए राष्ट्रपति की भांति महाभियोग का कोई प्रावधान नहीं है।

राज्यपाल की प्रमुख विवेकाधीन शक्तियाँ:

  1. अविश्वास-प्रस्ताव पारित होने के पश्चात, मुख्यमंत्री द्वारा सलाह देने पर राज्यपाल विधान सभा भंग कर सकते हैं। इसके पश्चात, यह राज्यपाल पर निर्भर करता है कि वह आगे क्या निर्णय लेगें।
  2. वह, राज्य में संवैधानिक मशीनरी की विफलता के बारे में राष्ट्रपति को सिफारिश कर सकते हैं।
  3. वह, राज्य विधायिका द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति की सहमति के लिए आरक्षित कर सकते हैं।
  4. विधानसभा में किसी भी राजनीतिक दल के स्पष्ट बहुमत नहीं होने पर, राज्यपाल द्वारा किसी को भी मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त किया जा सकता है।
  5. राज्यपाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम सरकारों द्वारा, स्वायत्त जनजातीय जिला परिषदों को खनिज उत्खनन के लिए लाइसेंस से प्राप्त रॉयल्टी की, देय राशि का निर्धारण करता है।
  6. राज्य के प्रशासनिक और विधायी मामलों के संबंध में मुख्यमंत्री से जानकारी प्राप्त कर सकता है।
  7. राज्य विधायिका द्वारा पारित किसी भी साधारण बिल पर सहमति देने से इनकार कर सकता है।

राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति के साथ समस्या:

  • राज्यपाल को केवल केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है।
  • राष्ट्रपति के विपरीत, राज्यपाल का कार्यकाल निश्चित नहीं होता है। वह केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी की इच्छानुसार पद धारित करता है।
  • नियुक्ति का तरीका और कार्यकाल की अनिश्चितता दोनों, राज्यपाल को राजनीति प्रेरित परिस्थितियों में केंद्र सरकार के अनुसार कार्य करने हेतु बाध्य कर सकते है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

भारत के राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर के तहत वारंट द्वारा किन पदों पर नियुक्तियां की जाती हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 163 और 174 का अवलोकन
  2. जब विधानसभा सत्र बुलाने की बात आती है तो क्या राज्यपाल मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य होते हैं?
  3. मुख्यमंत्री की नियुक्ति कौन करता है?
  4. राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ
  5. राज्यपाल का कार्यकाल

मेंस लिंक:

राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

सहकारिता मंत्रालय


(Ministry of Cooperation)

संदर्भ:

देश में ‘सहकारिता आंदोलन’ को मजबूत करने के लिए एक नया ‘सहकारिता मंत्रालय’ (Ministry of Cooperation) का गठन किया गया है।

नए मंत्रालय की भूमिकाएं / कार्य:

  1. यह मंत्रालय देश में सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने के लिए एक अलग प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत ढांचा प्रदान करेगा।
  2. यह सहकारी समितियों को जमीनी स्तर तक पहुंचने वाले एक सच्चे जनभागीदारी आधारित आंदोलन को मजबूत बनाने में भी सहायता प्रदान करेगा।
  3. यह मंत्रालय सहकारी समितियों के लिए ‘कारोबार में सुगमता’ के लिए प्रक्रियाओं को कारगर बनाने और बहु-राज्य सहकारी समितियों (multi-state cooperatives – MSCS) के विकास को सक्षम बनाने की दिशा में कार्य करेगा।

‘सहकारी समितियां’ क्या होती हैं?

(Cooperative Societies)

  • सहकारी समिति, संयुक्त-स्वामित्व और लोकतांत्रिक रूप से नियंत्रण के माध्यम से, अपने सामूहिक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए, स्वेच्छा से एकजुट हुए व्यक्तियों का एक स्वायत्त संघ होती है।
  • इन समितियों में, लाभकारिता की आवश्यकता, समिति के सदस्यों की आवश्यकताओं और समुदाय के व्यापक हितों से संतुलित होती है।

सहकारी समितियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान:

  1. संविधान (97वां संशोधन) अधिनियम, 2011 के माध्यम से, भारत में कार्यरत सहकारी समितियों के संबंध में संविधान के भाग IXA (नगरपालिका) के ठीक बाद एक नया भाग IXB जोड़ा गया।
  2. इसी संशोधन द्वारा, संविधान के भाग III के अंतर्गत अनुच्छेद 19(1)(c) में भारत के सभी नागरिकों को ‘संगम या संघ’ के साथ-साथ ‘सहकारी समिति’ बनाने का मूल अधिकार अंतःस्थापित किया गया है।
  3. सहकारी समिति के ऐच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यवाही, लोकत्रांत्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबन्धन में वृद्धि करने हेतु, संविधान में ‘राज्य के नीति निदेशक तत्वों’ (भाग IV) के अंतर्गत एक नया अनुच्छेद 43B जोड़ा गया है।

सरकार द्वारा सहयोग:

भारत सरकार द्वारा वर्ष 2002 में ‘बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम’ (Multi-State Co-operative Societies Act) लागू किया गया और सहकारी समितियों को ‘स्वायत्त, स्वतंत्र और लोकतांत्रिक संगठनों’ के रूप में प्रोत्साहित करने और इनके विकास के लिए सहयोग करने हेतु वर्ष 2002 में ‘राष्ट्रीय सहकारिता नीति भी तैयार की गई। जिससे ये सहकारी समितियां, देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में अपनी उचित भूमिका निभा सकें।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 2012 को ‘अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष’ घोषित किया गया था? Click here

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सहकारी समितियों के बारे में
  2. प्रकार
  3. भूमिकाएं और कार्य
  4. संवैधानिक प्रावधान

मेंस लिंक:

भारत में सहकारिता आन्दोलन के इतिहास पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

 केंद्रीय सूचना आयोग (CIC)


(Central Information Commission)

संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को ‘केंद्रीय सूचना आयोग’ (Central Information Commission) में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, रिक्तियों और लंबित मामलों की नवीनतम जानकारी को आधिकारिक तौर पर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

संबंधित प्रकरण:

उच्चतम न्यायालय में दायर एक याचिका में, वर्ष 2019 के एक फैसले में शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए निर्देशों को लागू करने के लिए सरकारी अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई है।

सुप्रीमकोर्ट के फैसले में,

  1. केंद्र और राज्य सरकारों को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों में रिक्त पदों को भरने के लिए कई निर्देश जारी किए थे।
  2. अदालत ने ‘केंद्रीय सूचना आयोग’ में मौजूद रिक्तियों को भरने के लिए केंद्र को तीन महीने का समय दिया था।

‘केंद्रीय सूचना आयोग’

(Central Information Commission)

केंद्रीय सूचना आयोग का गठन, सूचना अधिकार अधिनयम, 2005 के अंतर्गत, वर्ष 2005 में केंद्र सरकार द्वारा किया गया था।

  • सदस्य: आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त तथा अधिकतम दस सूचना आयुक्त होते हैं।
  • नियुक्ति: आयोग के सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा एक चयन समिति की सिफारिश पर नियुक्त किया जाता है। इस चयन समिति में अध्यक्ष के रूप में प्रधान मंत्री, तथा सदस्य के रूप में लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता और प्रधान मंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
  • कार्यकाल: मुख्य सूचना आयुक्त और एक सूचना आयुक्त, केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित अवधि तक या 65 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, पद पर कार्यरत रहते हैं।
  • आयोग के सदस्य पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं होते हैं।

‘केंद्रीय सूचना आयोग’ के कार्य एवं शक्तियां:

  1. आयोग का प्रमुख कार्य, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत मांगी गई जानकारी के संबंध में किसी भी व्यक्ति की शिकायत प्राप्त करना और उसकी जांच करना है।
  2. आयोग, उचित आधार होने पर (स्वतः संज्ञान लेते हुए) किसी भी मामले में जांच का आदेश दे सकता है।
  3. जांच के दौरान, आयोग के पास किसी भी संबंधित व्यक्ति को बुलाने, दस्तावेजों की मांग करने आदि के संबंध में एक सिविल कोर्ट के समान शक्तियां होती हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’, 2005 में संशोधन के द्वारा केंद्र सरकार को देश में सभी सूचना आयुक्तों के कार्यकाल, वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों को निर्धारित करने हेतु नियम बनाने का अधिकार दिया गया है? आरटीआई अधिनियम, 2005 के तहत सूचना आयुक्तों का कार्यकाल पांच वर्ष, या पैंसठ वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, निर्धारित किया गया था। आरटीआई अधिनियम में अन्य कौन से परिवर्तन किए गए हैं? Read here

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आरटीआई अधिनियम के बारे में
  2. सीआईसी और आईसी की शक्तियां और कार्य
  3. नियुक्ति और पदमुक्ति

मेंस लिंक:

केन्द्रीय सूचना आयोग में सुधारों की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

कप्पा और लैम्डा – Sars-CoV-2 के नए वेरिएंट


(Kappa And Lambda- Newest Sars-CoV-2 Variants)

संदर्भ:

हाल ही में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा कोविड- 19 के ‘कप्पा’ (Kappa) और लैम्डा (Lambda) वेरिएंट को ‘वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट’ (Variant of Interest – VoI) के रूप में नामित किया गया है।

भारत के लिए चिंता के विषय:

  1. ‘कप्पा’ वैरिएंट के बारे में सबसे पहले भारत में पता चला था और देश में GISAID पहल के लिए जमा किए गए 30,000 संचयी नमूनों में 3,500 से अधिक नमूने इसी वैरिएंट के हैं।
  2. पिछले 60 दिनों में, भारत द्वारा जमा किए गए सभी नमूनों में 3 प्रतिशत कप्पा वैरिएंट के नमूने है। वास्तव में, GISAID तालिका में कप्पा वैरिएंट के नमूने जमा करने में भारत शीर्ष स्थान पर है, और इसके पश्चात् ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आदि का स्थान है।

लैम्डा वैरिएंट’ क्या है?

(Lambda Variant)

लैम्डा, संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी द्वारा चिह्नित किया गया नवीनतम ‘वेरिएंट ऑफ इंटरेस्ट’ (VoI) है।

  • इस वैरिएंट की पहचान पहली बार पिछले साल दिसंबर में ‘पेरू’ में की गई थी और GISAID के साथ, लगभग 26 देशों द्वारा अब तक साझा किए गए नमूनों में इस वैरिएंट का पता चला है।
  • इस वैरिएंट के सर्वाधिक नमूने ‘चिली’ में पाए गए है, इसके बाद सूची में क्रमशः अमेरिका और पेरू का स्थान है।

‘वैरिएंट ऑफ़ इंटरेस्ट’ (VoI) क्या होता है?

  • ‘वैरिएंट ऑफ़ इंटरेस्ट’ का तात्पर्य, किसी वायरस में होने वाले उन आनुवंशिक उत्परिवर्तनों से होता है, जो ‘संचारण क्षमता और बीमारी की गंभीरता को प्रभावित करने, या प्रतिरक्षा से बचाव करने के लिए जाने जाते है, या इसके लिए भविष्यवाणी की जाती है।
  • किसी वैरिएंट को ‘वैरिएंट ऑफ़ इंटरेस्ट’ के रूप में नामित करना इस तथ्य की स्वीकृति भी होती है, कि यह वैरिएंट कई देशों और जनसंख्या समूहों में महत्वपूर्ण सामुदायिक प्रसारण का कारण बन चुका है।

वेरिएंट ऑफ कंसर्न (VOC):

(Variant of Concern)

जब किसी वेरिएंट की वजह से, वायरस संक्रामकता में वृद्धि, बीमारी का अधिक गंभीर होना (जैसे- अस्पताल में भर्ती या मृत्यु हो जाना), पिछले संक्रमण या टीकाकरण के दौरान उत्पन्न एंटीबॉडी में महत्त्वपूर्ण कमी, उपचार या टीके की प्रभावशीलता में कमी या नैदानिक उपचार की विफलता देखने को मिलती है, तो उसे ‘वेरिएंट ऑफ कंसर्न’ (VOC) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि GISAID, WHO द्वारा 2008 में देशों के लिए जीनोम अनुक्रम साझा करने के लिए शुरू किया गया एक सार्वजनिक मंच है? इसके बारे में अधिक जानने हेतु देखें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जीनोम अनुक्रमण क्या है?
  2. क्रियाविधि
  3. आरएनए बनाम डीएनए
  4. जीन क्या होते हैं?
  5. ‘वैरिएंट ऑफ़ इंटरेस्ट’ (VoI) और ‘वेरिएंट ऑफ कंसर्न’ (VOC) क्या हैं?

मेंस लिंक:

‘जीनोम अनुक्रमण’ क्या होता है? यह कोविड- 19 के प्रसार को रोकने में किस प्रकार सहायक है?

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

टेली-लॉ कार्यक्रम


(Tele-Law programme)

संदर्भ:

हाल ही में, न्याय विभाग द्वारा ‘जन सेवा केंद्रों’ (Common Service Centres – CSC) के माध्यम से अपने टेली-लॉ कार्यक्रम के तहत 9 लाख से अधिक लाभार्थियों तक पहुंचने का नया कीर्तिमान बनने के अवसर पर एक कार्यक्रम आयोजित किया।

‘टेली-लॉ प्रोग्राम’ के बारे में:

इस कार्यक्रम का आरंभ, किसी मामले का मुकदमेबाजी शुरू होने से पहले के चरण में ही समाधान करने के उद्देश्य से, वर्ष 2017 में  इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सहयोग से ‘विधि एवं न्याय मंत्रालय द्वारा किया गया था।

  • इसके तहत, जिन वादियों को कानूनी सलाह की आवश्यकता होती है, उन्हें वकीलों से जोड़ने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं और टेलीफोन सेवाओं का उपयोग किया जाता है।
  • टेली-लॉ अवधारणा के अंतर्गत, ‘राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण’ (SALSA) और ‘जन सेवा केंद्रों’ (CSC) में तैनात वकीलों के एक पैनल के माध्यम से कानूनी सलाह देने की सुविधा प्रदान की जाती है।
  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य ज़रूरतमंदों, विशेषकर हाशिए पर रहने वाले और वंचित व्यक्तियों तक विधिक सहायता पहुँचाना है।

लाभ / महत्व:

  • टेली लॉ सर्विस, किसी को भी अपना कीमती समय और पैसा बर्बाद किए बिना कानूनी सलाह लेने में सक्षम बनाती है।
  • विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के तहत उल्लिखित मुफ्त कानूनी सहायता के लिए पात्र लोगों के लिए यह सेवा निःशुल्क है। अन्य सभी से इस सेवा के लिए मामूली शुल्क लिया जाता है।
  • यह पहल. ‘सतत विकास लक्ष्य-16’ (SDG-16) के अनुरूप है। SDG-16 का उद्देश्य “सतत विकास के लिए शांतिपूर्ण और समावेशी समाजों को बढ़ावा देना, सभी के लिए न्याय तक पहुंच प्रदान करना और सभी स्तरों पर प्रभावी, जवाबदेह और समावेशी संस्थानों का निर्माण करना” है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

समाज के कमजोर वर्गों को मुफ्त कानूनी सेवाएं प्रदान करने और विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए लोक अदालतों का आयोजन करने के लिए ‘विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम’, 1987 के तहत ‘राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण’ (NALSA) का गठन किया गया है। इसके बारे में अधिक जानने हेतु देखें (संक्षेप में पढ़ें)।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. NALSA के बारे में
  2. सीएससी के बारे में
  3. टेली लॉ प्रोग्राम क्या है?
  4. ‘लोक अदालत’ के बारे में

स्रोत: पीआईबी।

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

क्षतिपूर्ति संबंधी मुद्दों से अमेरिकी वैक्सीन अनुदान में बाधा


संदर्भ:

क्षतिपूर्ति संबंधी नियामक मुद्दों की वजह से अमेरिका द्वारा किए जाने वाले वैक्सीन अनुदान में बाधा पड़ रही है।

पृष्ठभूमि:

अमेरिका द्वारा भारत सहित दर्जनों देशों के लिए अमेरिका निर्मित कोविड-19 टीकों की 80 मिलियन खुराकें दान करने की घोषणा की गई थी।

‘क्षतिपूर्ति शर्त’ के बारे में:

(Indemnity Clause)

सरल शब्दों में, क्षतिपूर्ति का अर्थ, किसी नुकसान की स्थिति में अथवा वित्तीय तनाव के विरुद्ध प्रदान की जाने वाली सुरक्षा होता है।

  • कानूनी भाषा में, इसका अर्थ, किसी एक पक्ष द्वारा, उसकी वजह से होने वाले नुकसान की भरपाई, दूसरे पक्ष के लिए करना उसका संविदात्मक दायित्व होता है।
  • यह शर्त, आमतौर पर बीमा अनुबंधों में प्रयोग की जाती है।

भारत के मामले में, यदि सरकार विदेशी टीका निर्माताओं को देश में अपनी वैक्सीन शुरू करने के लिए क्षतिपूर्ति सुरक्षा देती है, तो टीका लेने के बाद किसी तरह की शिकायत करने वाले नागरिकों को क्षतिपूर्ति करने का दायित्व सरकार का होगा, न कि वैक्सीन निर्माता का।

क्षतिपूरण के लिए अपवाद:

क्षतिपूरण (indemnification) हेतु कई सामान्य अपवाद हैं।

क्षतिपूर्ति प्रावधान के तहत उन दावों या हानियों के लिए क्षतिपूर्ति दिए जाने की सूची से बाहर किया जा सकता है, जो क्षतिपूर्ति प्राप्त करने वाले पक्ष के निम्नलिखित कार्यों की वजह से होते हैं:

  1. लापरवाही या घोर लापरवाही।
  2. उत्पादों का अनुचित तरीके से उपयोग।
  3. समझौते में अपने दायित्वों का पालन करने में विफलता।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि WHO ने Covax गठबंधन के माध्यम से कोविड-19 टीकों के लिए एक नो फॉल्ट क्षतिपूर्ति कार्यक्रम’ शुरू किया है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘क्षतिपूर्ति शर्त’ क्या है?
  2. इसका प्रयोग प्रायः कहाँ किया जाता है?
  3. लाभ
  4. भारत में आयात किए जा रहे महत्वपूर्ण टीके।

मेंस लिंक:

क्षतिपूर्ति शर्त के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


नवेगांव-नागझिरा टाइगर रिज़र्व (NNTR)

हाल ही में महाराष्ट्र के ‘नवेगांव-नागझिरा टाइगर रिज़र्व’ (Navegaon-Nagzira Tiger Reserve- NNTR) में एक दुर्लभ मेलानिस्टिक तेंदुआ (Melanistic Leopard) देखा गया है। आमतौर पर इसे ब्लैक पैंथर (Black Panther) के रूप में जाना जाता है।

  • इस टाइगर रिजर्व में, नवेगांव राष्ट्रीय उद्यान, नवेगांव वन्यजीव अभयारण्य, नागझिरा वन्यजीव अभयारण्य, नया नागझिरा वन्यजीव अभयारण्य और कोका वन्यजीव अभयारण्य के अधिसूचित क्षेत्र शामिल हैं।
  • NNTR, मध्य भारत के प्रमुख बाघ अभयारण्यों जैसे मध्य प्रदेश के कान्हा और पेंच टाइगर रिजर्व, महाराष्ट्र के पेंच और ताडोबा-अंधारी टाइगर रिजर्व, छत्तीसगढ़ के इंद्रावती और अचानकमार टाइगर रिजर्व तथा, अप्रत्यक्ष रूप से तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कवल और नागार्जुनसागर टाइगर रिजर्व के साथ जुड़ा हुआ है।
  • यह उमरेद-करहंदला अभयारण्य और ब्रह्मपुरी डिवीज़न (महाराष्ट्र) जैसे महत्त्वपूर्ण बाघ क्षेत्रों से भी जुड़ा हुआ है।

भालिया गेहूं

(Bhalia wheat)

हाल ही में, भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication- GI) प्रमाणित भालिया किस्म के गेहूं की पहली खेप गुजरात से केन्या और श्रीलंका को निर्यात की गई है।

  • जीआई प्रमाणित गेहूं की इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है और यह स्वाद में मीठा होता है।
  • भालिया गेहूं की फसल प्रमुख रुप से गुजरात के भाल क्षेत्र में पैदा की जाती है।
  • गेहूं की इस किस्म की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि इसे बारिश के मौसम में बिना सिंचाई के उगाया जाता है और गुजरात में लगभग दो लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि में इसकी खेती की जाती है।

यह बिना सिंचाई के बारानी परिस्थितियों में उगाया जाता है और गुजरात में लगभग दो लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में खेती की जाती है।

 

खादी प्राकृतिक पेंट

(Khadi Prakritik Paint)

हाल ही में, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री श्री नितिन गडकरी खादी प्राकृतिक पेंट के ‘ब्रांड एंबेसेडर’ बने हैं।

  • यह खादी और ग्रामोद्योग आयोग द्वारा विकसित यह गाय के गोबर से निर्मित भारत का पहला पेंट है।
  • यह एक पर्यावरण के अनुकूल, गैर विषाक्त पेंट है,यह अपनी तरह का पहला उत्पाद है, जिसमें एंटी-फंगल और एंटी-बैक्टीरियल गुण समाहित हैं।
  • यह पेंट किसानों की आय बढ़ाने और देश में स्वरोजगार पैदा करने के दोहरे उद्देश्यों के साथ लॉन्च किया गया है।

सोशल मीडिया बोल्ड है।

 सोशल मीडिया युवा है।

 सोशल मीडिया पर उठे सवाल सोशल मीडिया एक जवाब से संतुष्ट नहीं है।

 सोशल मीडिया में दिखती है ,

बड़ी तस्वीर सोशल मीडिया हर विवरण में रुचि रखता है।

 सोशल मीडिया उत्सुक है।

 सोशल मीडिया स्वतंत्र है। 

 सोशल मीडिया अपूरणीय है। 

लेकिन कभी अप्रासंगिक नहीं। सोशल मीडिया आप हैं।

 (समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

 

KANISHKBIOSCIENCE E -LEARNING PLATFORM - आपको इस मुद्दे से परे सोचने में मदद करता है, लेकिन UPSC प्रीलिम्स और मेन्स परीक्षा के दृष्टिकोण से मुद्दे के लिए प्रासंगिक है। इस 'संकेत' प्रारूप में दिए गए ये लिंकेज आपके दिमाग में संभावित सवालों को उठाने में मदद करते हैं जो प्रत्येक वर्तमान घटना से उत्पन्न हो सकते हैं !


kbs  हर मुद्दे को उनकी स्थिर या सैद्धांतिक पृष्ठभूमि से जोड़ता है।   यह आपको किसी विषय का समग्र रूप से अध्ययन करने में मदद करता है और हर मौजूदा घटना में नए आयाम जोड़कर आपको विश्लेषणात्मक रूप से सोचने में मदद करता है।

 केएसएम का उद्देश्य प्राचीन गुरु - शिष्य परम्परा पद्धति में "भारतीय को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना" है। 

 

अफ्रीकन स्वाइन फीवर


(African Swine Fever)

संदर्भ:

एशिया के छोटे फ़ार्म, ‘अफ्रीकन स्वाइन फीवर’ (African Swine Fever) के प्रकोप से सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। क्यों?

  1. सुअर फार्म, मुख्य रूप से छोटे किसानो से मामला बने हुए है।
  2. भारत सहित कई देशों में, 70 प्रतिशत सुअर फार्मों का स्वामित्व छोटे किसानों के पास है।
  3. चीन में होने वाले कुल सूअर-मांस उत्पादन का लगभग 98 प्रतिशत, छोटे किसानों द्वारा किया जाता है। इन किसानों के पास सूअरों की संख्या 100 से कम ही होती है।

भारत में ‘अफ्रीकन स्वाइन फीवर’ का प्रभाव:

अफ्रीकी स्वाइन फीवर लगभग एक सदी पुरानी बीमारी है, जो घरेलू सूअरों और जंगली सूअरों को संक्रमित करती है, और इसके संक्रमण से मृत्यु दर लगभग 100 प्रतिशत होती है। इस बीमारी से, वर्ष  2018 से विश्व के लगभग एक तिहाई सूअर मारे जा चुके हैं।

  • इस बीमारी का नवीनतम शिकार भारत है। यहाँ मई 2020 से इससे संक्रमित मामले सामने आ रहे थे, किंतु पिछले कुछ महीनों में इनकी संख्या में जबर्दस्त विस्फोट हुआ है।
  • अनुमानों के अनुसार, अफ्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) की वजह से पूर्वोत्तर राज्यों के सूअर-मांस उत्पादन में 50 प्रतिशत की कमी हुई है।

अफ्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) के बारे में:

  • ASF एक अत्यधिक संक्रामक और घातक पशु रोग है, जो घरेलू और जंगली सूअरों को संक्रमित करता है। इसके संक्रमण से सूअर एक प्रकार के तीव्र रक्तस्रावी बुखार (Hemorrhagic Fever) से पीड़ित होते है।
  • इसे पहली बार 1920 के दशक में अफ्रीका में देखा गया था।
  • इस रोग में मृत्यु दर 100 प्रतिशत के करीब होती है, और इस बुखार का कोई इलाज नहीं है।
  • इसके लिए अभी तक कोई मान्यता प्राप्त टीका नहीं खोजा गया है, इसी वजह से, संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए, संक्रमित जानवरों को मार दिया जाता है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि अफ्रीकी स्वाइन फीवर (ASF) ‘विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन’ (World Organisation for Animal Health – OIE) की ‘स्थलीय पशु स्वास्थ्य संहिता’ में सूचीबद्ध एक बीमारी है? Read here

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. क्या स्वाइन फीवर मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है?
  2. क्या यह एक वायरल बीमारी है?
  3. इसकी खोज सबसे पहले कहाँ हुई थी?
  4. 2020 में कौन से देश इससे प्रभावित हुए हैं?
  5. क्या इसके खिलाफ कोई टीका उपलब्ध है?  

    मेंस लिंक:

    अफ्रीकी स्वाइन स्वाइन फीवर, लक्षण और इसके प्रसरण पर एक टिप्पणी लिखिए।

    स्रोत: डाउन टू अर्थ।

     

    विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

    अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर


    (Authorised Economic Operator)

    संदर्भ:

    हाल ही में, ‘केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड’ (Central Board of Indirect Taxes & Customs- CBIC) द्वारा ‘अधिकृत आर्थिक ऑपरेटरों’ (Authorised Economic Operators- AEO) के आवेदनों की ऑनलाइन फाइलिंग की व्यवस्था का आरंभ किया गया है।

    इस वेब एप्लिकेशन का नया संस्करण (V 2.0), समय पर हस्तक्षेप करने और उनमें तेजी लाने के उद्देश्य से भौतिक रूप से दाखिल किए गये आवेदनों की निरंतर और डिजिटल निगरानी सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

    अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर (AEO) कार्यक्रम

    (Authorised Economic Operator)

  6. AEO, वैश्विक व्यापार को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने हेतु ‘विश्व सीमा शुल्क संगठन सेफ फ्रेमवर्क’ (World Customs Organization SAFE Framework) मानकों के तत्वावधान में एक कार्यक्रम है।
  7. कार्यक्रम का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा को बढ़ाना और वैध माल की आवाजाही को सुविधाजनक बनाना है।
  8. अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर (AEO) एक स्वैच्छिक अनुपालन कार्यक्रम है।

यह किस प्रकार कार्य करता है?

  • इस कार्यक्रम के तहत, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में संलग्न किसी इकाई को WCO द्वारा आपूर्ति श्रंखला सुरक्षा मानकों के अनुपालक (compliant) के रूप में अनुमोदित किया जाता है और AEO का दर्जा और कुछ लाभ प्रदान किए जाते हैं।
  • AEO दर्जा हासिल होने पर व्यापारिक इकाई को प्राप्त होने वाले लाभों में, निकासी में शीघ्रता, कम निरीक्षण, बेहतर सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला भागीदारों के मध्य संचार आदि शामिल होते हैं।

SAFE फ्रेमवर्क

  • जून 2005 में ‘विश्व सीमा शुल्क संगठन’ (WCO) परिषद द्वारा ‘वैश्विक व्यापार को सुरक्षित और सुगम बनाने हेतु मानक फ्रेमवर्क’ अर्थात SAFE फ्रेमवर्क को लागू किया गया था। यह फ्रेमवर्क, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के लिए एक निवारक, राजस्व संग्रह को सुरक्षित करने और पूरे विश्व में व्यापार सुविधा को बढ़ावा देने के रूप में कार्य करेगा।
  • SAFE फ्रेमवर्क, आजमाए जा चुके और दुनिया भर में अच्छी तरह से काम कर रहे आधारिक मानकों का निर्धारण करता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि ‘केंद्रीय राजस्व नियंत्रण प्रयोगशाला’ को ‘विश्व सीमा शुल्क संगठन’ की ‘क्षेत्रीय सीमा शुल्क प्रयोगशाला’ (RCL) के रूप में मान्यता प्राप्त है? इसके बारे में अधिक जानने के लिए पढ़ें  

प्रीलिम्स लिंक:

  1. SAFE फ्रेमवर्क के बारे में
  2. WCO के बारे में
  3. AEO कार्यक्रम
  4. AEO कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएं

मेंस लिंक:

अधिकृत आर्थिक ऑपरेटर (AEO) कार्यक्रम के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नासा के कैसिनी अंतरिक्ष यान की नवीनतम खोजें


संदर्भ:

हाल ही में, नासा के ‘कैसिनी अंतरिक्ष यान’ (Cassini spacecraft) द्वारा शनि ग्रह के चंद्रमाओं ‘प्लूमस’ (Plumes) से उड़ान भरने के दौरान निम्नलिखित खोजें की गई हैं:

  1. शनि के एक चंद्रमा ‘टाइटन’ (Titan) के वायुमंडल में मीथेन गैस मौजूद है।
  2. एन्सेलेडस (Enceladus) नामक एक अन्य चंद्रमा पर एक ‘तरल महासागर’ मौजूद है जिसमें से गैस और पानी के ‘प्लूमस’ का प्रस्फुटन होता रहता है।

शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है, कि ‘एन्सेलेडस’ पर भी अज्ञात मीथेन-उत्पादक प्रक्रियाएं होने की संभावना है, और इस विषय पर खोज की जानी बाकी है।

पृथ्वी पर मीथेन-उत्पादक जीव:

पृथ्वी पर पायी जाने वाली अधिकाँश मीथेन ‘जैविक’ (Biological) स्रोतों से उत्पन्न होती है। मीथेनोजेंस (Methanogens) नामक सूक्ष्मजीव एक ‘चयापचय उपोत्पाद’ (Metabolic Byproduct) के रूप में मीथेन का उत्पादन करने में सक्षम होते हैं।

  • इन जीवों के लिए जीवित रहने हेतु ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है और ये प्रकृति में व्यापक रूप से पाए जाते हैं।
  • मिथेनोजेन, दलदलों, मृत कार्बनिक पदार्थों और यहां तक ​​कि मनुष्यों की आंत में भी पाए जाते हैं।
  • ये उच्च तापमान में जीवित रहने के लिए जाने जाते हैं और सिमुलेशन अध्ययनों से पता चला है, कि ये सूक्ष्मजीव मंगल ग्रह पर मौजूद स्थितियों में जीवित रहने में सक्षम हैं।

एन्सेलेडस पर मीथेन का उत्पादन अन्य किस तरीके से हो सकता है?

  1. एन्सेलेडस के कोर में मौजूद कार्बनिक पदार्थों के रासायनिक विघटन से मीथेन का निर्माण हो सकता है।
  2. इस चंद्रमा पर होने वाली ‘जलतापीय अभिक्रियाएँ’ (Hydrothermal Processes) भी कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन के निर्माण में सहायक हो सकती हैं।

‘कैसिनी मिशन’ के बारे में:

‘कैसिनी मिशन’ (Cassini Mission) को वर्ष 1997 में लॉन्च किया गया था।

  • यह नासा (NASA), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (European Space Agency- ESA) और इतालवी अंतरिक्ष एजेंसी का संयुक्त मिशन है।
  • यह मिशन, बाहरी सौर मंडल में अब तक की पहली लैंडिंग थी।
  • कैसिनी, शनि ग्रह की यात्रा करने वाला चौथा और इसकी कक्षा में प्रवेश करने वाला पहला अंतरिक्ष यान है।
  • इसके डिजाइन में एक ‘शनि ऑर्बिटर’ और ‘टाइटन चंद्रमा’ के लिए एक लैंडर (lander) शामिल किया गयाहै। हैगेन्स (Huygens) नामक यह लैंडर वर्ष 2005 में टाइटन पर उतरा था।

मिशन के उद्देश्य:

  • शनि के वलयों की त्रि-आयामी संरचना और गतिक क्रियाओं का निर्धारण करना।
  • उपग्रह सतहों की संरचना और प्रत्येक पिंड के भूवैज्ञानिक इतिहास का निर्धारण करना।
  • इपेटस चंद्रमा (Iapetus Moon) के मुख्य गोलार्ध पर ‘डार्क मटेरियल’ की प्रकृति और उत्पत्ति का निर्धारण करना।
  • मैग्नेटोस्फीयर (magnetosphere) की त्रि-आयामी संरचना और गतिक क्रियाओं का आकलन करना।
  • बादलों के स्तर पर शनि ग्रह के वातावरण की गतिक क्रियाओं का अध्ययन करना।
  • ‘टाइटन’ के बादलों और धुंध की समय-परिवर्तनशीलता का अध्ययन करना।
  • क्षेत्रीय स्तर पर ‘टाइटन’ की सतह के बारे में जानकारी हासिल करना।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

नासा का वॉयेजर-2 इंटरस्टेलर स्पेस में प्रवेश करने वाला वॉयेजर-1 के बाद दूसरा अंतरिक्ष यान है? इंटरस्टेलर स्पेस कहाँ से शुरू होता है? इस बारे में जानने हेतु पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कैसिनी मिशन के बारे में
  2. उद्देश्य
  3. शनि ग्रह- प्रमुख तथ्य
  4. शनि ग्रह के चंद्रमा
  5. मीथेन के बारे में

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।

कृषि अवसंरचना कोष


(Agriculture Infrastructure Fund)

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ‘कृषि अवसंरचना कोष’ (Agriculture Infrastructure Fund – AIF) के अंतर्गत वित्तपोषण सुविधा की केंद्रीय क्षेत्र योजना में विभिन्न संशोधनों को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी गयी है।

नवीनतम संशोधन:

  1. योजना के तहत, पात्रता को विस्तारित करते हुए इसमें, राज्य एजेंसियों / APMCs, राष्ट्रीय और राज्य सहकारी समितियों के परिसंघों, किसान उत्पादक संगठनों के परिसंघों (FPOs) तथा स्वयं सहायता समूहों के परिसंघों (SHGs) को भी शामिल किया गया है।
  2. कृषि उपज बाजार समितियों (Agricultural Produce Market Committee – APMC) के लिए एक ही बाजार आहाता के भीतर विभिन्न अवसंरचनाओं जैसे कोल्ड स्टोरेज, सार्टिंग,ग्रेडिंग और परख इकाइयों, कोठों (साइलो) आदि की प्रत्येक परियोजना के लिए 2 करोड़ रुपये तक के ऋण पर ब्याज सहायता प्रदान की जाएगी।
  3. कृषि और किसान कल्याण मंत्री के लिए, योजना में किसी लाभार्थी को शामिल करने या हटाने के संबंध में आवश्यक परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
  4. वित्तीय सुविधा की अवधि 4 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष अर्थात 2025-26 तक कर दी गई है और इस योजना की कुल अवधि 10 से बढ़ाकर 13 अर्थात 2032-33 तक कर दी गई है।

‘कृषि अवसंरचना कोष’ के बारे में:

  • ‘कृषि अवसंरचना फंड / कोष’, ब्याज छूट तथा ऋण गारंटी के जरिये फसल उपरांत प्रबंधन अवसंरचना तथा समुदाय खेती के लिए व्यावहार्य परियोजनाओं में निवेश करने के लिए एक मध्यम-दीर्घ अवधि ऋण वित्तपोषण सुविधा है।
  • इस योजना के तहत, सालाना 3 प्रतिशत की ब्याज छूट के साथ ऋण के रूप में बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों द्वारा 1 लाख करोड़ रुपये तथा 2 करोड़ रुपये तक के ऋण के लिए CGTMSE के तहत क्रेडिट गारंटी कवरेज उपलब्ध कराई जाएगी।

पात्र लाभार्थी:

इस योजना के अंतर्गत पात्र लाभार्थियों में, प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PAC), विपणन सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), स्वयं सहायता समूहों (SHGs), किसानों, संयुक्त देयता समूहों (Joint Liability Groups- JLG), बहुउद्देशीय सहकारी समितियों, कृषि उद्यमियों, स्टार्टअपों, और केंद्रीय/राज्य एजेंसी या स्थानीय निकाय प्रायोजित सार्वजनिक-निजी साझीदारी परियोजनाएं आदि को शामिल किया गया है।

ब्याज में छूट:

इस वित्तपोषण सुविधा के अंतर्गत, सभी प्रकार के ऋणों में प्रति वर्ष 2 करोड़ रुपये की सीमा तक ब्याज में 3% की छूट प्रदान की जाएगी। यह छूट अधिकतम 7 वर्षों के लिए उपलब्ध होगी।

क्रेडिट गारंटी:

  • 2 करोड़ रुपये तक के ऋण के लिए ‘क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज’ (CGTMSE) योजना के अंतर्गत इस वित्तपोषण सुविधा के माध्यम से पात्र उधारकर्ताओं के लिए क्रेडिट गारंटी कवरेज भी उपलब्ध होगा।
  • इस कवरेज के लिए सरकार द्वारा शुल्क का भुगतान किया जाएगा।
  • FPOs के मामले में, कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभाग (DACFW) के FPO संवर्धन योजना के अंतर्गत बनाई गई इस सुविधा से क्रेडिट गारंटी का लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

‘कृषि अवसंरचना कोष का प्रबंधन:

  • ‘कृषि अवसंरचना कोष का प्रबंधन और निगरानी ऑनलाइन ‘प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (MIS) प्लेटफॉर्म के माध्यम से की जाएगी।
  • सही समय पर मॉनिटरिंग और प्रभावी फीडबैक की प्राप्ति को सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर मॉनिटरिंग कमिटियों का गठन किया जाएगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘पीएम स्वानिधि’ के तहत, ‘क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज’ (CGTMSE) के माध्यम से ऋण देने वाली संस्थाओं के लिए ‘क्रेडिट गारंटी’ का प्रबंधन ‘सिडबी’ द्वारा किया जाएगा? CGTMSE के बारे में अधिक जानने हेतु देखें।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘कृषि अवसंरचना निधि’ के बारे में
  2. FPOs क्या हैं?
  3. सहकारी समितियां (Cooperatives) क्या हैं? संवैधानिक प्रावधान
  4. CGTMSE के बारे में
  5. केंद्रीय क्षेत्रक तथा केंद्र प्रायोजित योजनाएं

स्रोत: पीआईबी।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

मानव-वन्यजीव संघर्ष पर रिपोर्ट


संदर्भ:

हाल ही में, ‘प्रकृति संरक्षण हेतु विश्व वन्यजीव कोष’ (Worldwide Fund for Nature – WWF) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UN Environment Programme – UNEP) द्वारा ‘सभी के लिये बेहतर भविष्य- मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व की आवश्यकता’ (A future for all – the need for human-wildlife coexistence) शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की गई है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  1. मनुष्यों और जानवरों के मध्य संघर्ष, विश्व की कुछ सर्वाधिक ‘अनुप्रतीकात्मक प्रजातियों’ (iconic species) के दीर्घकालिक अस्तित्व के लिए मुख्य खतरों में से एक है।
  2. विश्व स्तर पर, मानव-वन्यजीव संघर्षों में होने वाली मौतें, विश्व की 75 प्रतिशत से अधिक जंगली बिल्ली-प्रजातियों को प्रभावित करती है। इस संघर्ष से, धुर्वीय भालू, भूमध्यसागरीय मोंक सील (monk seals) और हाथियों जैसे बड़े शाकाहारी जीव भी प्रभावित होते हैं।
  3. 1970 के बाद से वैश्विक वन्यजीव आबादी में औसतन 68 प्रतिशत की गिरावट आई है।

भारतीय परिदृश्य:

  • वर्ष 2014-2015 और 2018-2019 के बीच 500 से अधिक हाथी मारे गए। इनमे से अधिकाँश मौतें मानव-हाथी संघर्ष के कारण हुईं हैं।
  • इसी अवधि के दौरान मानव-हाथी संघर्ष के परिणामस्वरूप 2,361 लोग मारे गए।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष से भारत सर्वाधिक प्रभावित होगा, क्योंकि इसमें विश्व दूसरी सर्वाधिक मानव निवास करती है, और साथ ही बाघों, एशियाई हाथियों, एक सींग वाले गैंडों, एशियाई शेरों और अन्य प्रजातियों की बड़ी आबादी पायी जाती है।

आवश्यकता:

मानव-वन्यजीव संघर्ष को पूर्ण रूप से समाप्त करना संभव नहीं है। लेकिन इसके प्रबंधन हेतु सुनियोजित, एकीकृत दृष्टिकोण, इन संघर्षों को कम कर सकता है, और मनुष्यों और जानवरों के बीच सह-अस्तित्व स्थापित करने में सफल हो सकता है।

शोणितपुर मॉडल:

  1. असम के शोणितपुर जिले में, जंगलों के विनाश से हाथी फसलों पर हमला करने के लिए मजबूर हो गए थे, जिसमे हाथी और मनुष्य दोनों मारे जाते थे।
  2. इसके समाधान हेतु, WWF इंडिया ने वर्ष 2003-2004 के दौरान एक ‘शोणितपुर मॉडल’ विकसित किया, जिसमे विभिन्न समुदायों के सदस्यों को राज्य वन विभाग से जोड़ा गया।
  3. इन लोगों को, हाथियों को फसलों से सुरक्षित रूप से दूर भगाने के लिए प्रशिक्षण दिया गया।
  4. WWF इंडिया ने हाथियों से फसलों की सुरक्षा को आसान बनाने हेतु एक कम लागत वाली, इकहरी (single strand), गैर-घातक बिजली की बाड़ भी विकसित की थी।
  5. इस मॉडल को लागू करने के बाद, चार साल में हाथियों द्वारा फसलों को किया जाने वाला नुकसान शून्य हो गया। और इससे, संघर्ष में होने वाले मानव तथा हाथियों की मौत में भी काफी कमी आई है।

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति (SC-NBWL) द्वारा अनुमोदित मानव-वन्यजीव संघर्ष (HWC) के प्रबंधन हेतु सलाहकारी निर्देश:

  • वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अनुसार समस्याग्रस्त जंगली जानवरों से निपटने के लिए ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाया जाना चाहिए।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष (HWC) के कारण होने वाली फसल-क्षति के लिए फसल मुआवजे के लिए प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना के तहत ऐड-ऑन कवरेज का उपयोग किया जाए।
  • वन क्षेत्रों के भीतर चारा और जल स्रोतों को बढाया जाना चाहिए।
  • अन्य उपाय: एडवाइजरी में स्थानीय/राज्य स्तर पर अंतर-विभागीय समितियों, पूर्व चेतावनी प्रणालियों को अपनाने, अवरोधकों का निर्माण करने, 24X7 कार्य करने वाले टोल फ्री हॉटलाइन नंबरों सहित समर्पित सर्कल-वार कंट्रोल रूम बनाने के लिए कहा गया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL), वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत गठित एक “वैधानिक बोर्ड” है। क्या आप जानते हैं कि बोर्ड का अध्यक्ष कौन होता है? इसके बारे में यहां पढ़ें

 

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980


(National Security Act)

संदर्भ:

हाल ही में, पूर्व सिविल सेवकों द्वारा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ (National Security Act) को एक कठोर निवारक निरोध कानून बताते हुए, इसके दुरुपयोग को समाप्त करने की मांग की गई है।

‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ (NSA) के बारे में:

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (National Security Act) अर्थात NSA एक निवारक निरोध कानून है।

  • निवारक निरोध (Preventive Detention) के अंतर्गत, किसी व्यक्ति के लिए, उसको भविष्य में अपराध करने से रोकने और/या भविष्य में अभियोजन से बचने के लिए, हिरासत में रखना (कैद करना) शामिल होता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 22 (3) (b) में, राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था संबंधी कारणों के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर निवारक निरोध और प्रतिबंध लगाने की अनुमति का प्रावधान किया गया है।

अनुच्छेद 22(4) के अनुसार:

निवारक निरोध का उपबंध करने वाली कोई विधि किसी व्यक्ति का तीन मास से अधिक अवधि के लिए तब तक निरुद्ध किया जाना प्राधिकृत नहीं करेगी जब तक कि— एक सलाहकार बोर्ड, तीन मास की उक्त अवधि के निरोध को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त कारणों का प्रतिवेदन नहीं करता है।

  • 44वें संशोधन अधिनियम, 1978 के द्वारा ‘सलाहकार बोर्ड’ की राय प्राप्त किए बिना नजरबंदी की अवधि को तीन महीने से घटाकर दो महीने कर दिया गया है।
  • हालाँकि, यह प्रावधान अभी तक लागू नहीं किया गया है, इसलिए, तीन महीने की मूल अवधि का प्रावधान अभी भी जारी है।

हिरासत की अवधि:

  • राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत, किसी व्यक्ति को बिना किसी आरोप के 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है। लेकिन यदि सरकार को कुछ नए साक्ष्य प्राप्त होते हैं तो यह अवधि आगे भी बढाई जा सकती है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उसके खिलाफ आरोपों को बताए बिना 10 दिनों के लिए हिरासत में रखा जा सकता है। हिरासत में लिया गया व्यक्ति उच्च न्यायालय के सलाहकार बोर्ड के समक्ष अपील कर सकता है लेकिन उसे मुकदमे के दौरान वकील रखने की अनुमति नहीं होती है।

इस कानून के दुरुपयोग से जुड़ी चिंताएं:

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(1) कहता है, कि गिरफ्तार किए गए किसी व्यक्ति को अपनी रुचि के विधि व्यवसायी से परामर्श करने और प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा।
  • ‘आपराधिक प्रक्रिया संहिता’ (CrPC) की धारा 50 के अनुसार, गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधार के बारे में सूचित किया जाना चाहिए और उसे जमानत हासिल करने का अधिकार प्राप्त है।

हालाँकि, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत, हिरासत में लिए गए व्यक्ति को इनमें से कोई भी अधिकार उपलब्ध नहीं होता है। इस क़ानून के तहत सरकार, उन जानकारियों को रोक सकती है, जिन्हें वह सार्वजनिक हित के विरुद्ध मानती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

भारत में निवारक निरोध कानूनों का इतिहास

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ (NSA) किसके द्वारा लगाया जा सकता है?
  2. निवारक निरोध के विरुद्ध अपील?
  3. NSA के तहत गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार
  4. इस संबंध में संवैधानिक अधिकारों की प्रयोज्यता
  5. संविधान के तहत याचिका

मेंस लिंक:

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम क्या है? इसे एक कठोर कानून के रूप में क्यों जाना जाता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


स्पर्श: सिस्टम फॉर पेंशन एडमिनिस्ट्रेशन (रक्षा)

SPARSH: System for Pension Administration (Raksha)

यह रक्षा विभाग से संबंधित पेंशन हेतु मंज़ूरी और संवितरण के ‘स्वचालन’ हेतु एक एकीकृत प्रणाली है।

  • इसे रक्षा मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा।
  • यह वेब-आधारित प्रणाली पेंशन दावों को संसाधित करती है और किसी बाहरी मध्यस्थ पर निर्भर हुए बिना उनकी पेंशन सीधे रक्षा पेंशनभोगियों के बैंक खातों में जमा करती है।
  • यह वेब-आधारित प्रणाली पेंशन दावों को संसाधित करती है और किसी बाहरी मध्यस्थ पर भरोसा किए बिना पेंशन को सीधे रक्षा पेंशनभोगियों के बैंक खातों में जमा करती है।

‘डीबीजेनवोक’

(dbGENVOC)

  • यह मुंह के कैंसर के जीनोमिक वेरिएंट संबंधी दुनिया का पहला डेटाबेस है।
  • इसे जैव प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित एक स्वायत्त संस्थान, ‘डीबीटी-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल जीनोमिक्स’ (NIBMG), कल्याणी द्वारा तैयार किया गया है। जो है। 

    सोशल मीडिया बोल्ड है।

     सोशल मीडिया युवा है।

     सोशल मीडिया पर उठे सवाल सोशल मीडिया एक जवाब से संतुष्ट नहीं है।

     सोशल मीडिया में दिखती है ,

    बड़ी तस्वीर सोशल मीडिया हर विवरण में रुचि रखता है।

     सोशल मीडिया उत्सुक है।

     सोशल मीडिया स्वतंत्र है। 

     सोशल मीडिया अपूरणीय है। 

    लेकिन कभी अप्रासंगिक नहीं। सोशल मीडिया आप हैं।

     (समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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जम्मू-कश्मीर में परिसीमन


(Delimitation in J&K)

संदर्भ:

‘जम्मू एवं कश्मीर परिसीमन आयोग’ के अनुसार, इसकी अंतिम रिपोर्ट 2011 की जनगणना के आधार पर तैयार की जाएगी और रिपोर्ट में भौगोलिक स्थिति, दुर्गम इलाकों तथा वर्तमान में जारी ‘परिसीमन प्रक्रिया’ (Delimitation Exercise) हेतु संचार के साधनों और उपलब्ध सुविधाओं को भी ध्यान में रखा जाएगा।

जम्मू-कश्मीर में परिसीमन प्रक्रिया- घटनाक्रम:

  1. जम्मू-कश्मीर में पहली परिसीमन प्रक्रिया वर्ष 1951 में एक परिसीमन समिति द्वारा निष्पादित की गई थी, और इसके तहत, तत्कालीन राज्य को 25 विधानसभा क्षेत्रों में विभक्त किया गया था।
  2. इसके पश्चात, वर्ष 1981 में पहली बार एक पूर्ण परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन किया गया था और इस आयोग द्वारा वर्ष 1981 की जनगणना के आधार पर वर्ष 1995 में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की गेन थी। इसके बाद से, राज्य में कोई अब तक कोई परिसीमन नहीं हुआ है।
  3. वर्ष 2020 में जम्मू-कश्मीर के लिए, वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने के लिए, एक ‘परिसीमन आयोग’ का गठन किया गया। इस आयोग को संघ-शासित प्रदेश में सात अन्य सीटों को जोड़ने तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदायों को आरक्षण देने का आदेश दिया गया।
  4. नए परिसीमन के पश्चात, जम्मू-कश्मीर में सीटों की कुल संख्या 83 से बढ़ाकर 90 कर दी जाएगी। ये सीटें ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ (PoK) के लिए आरक्षित 24 सीटों के अतिरिक्त होंगी और इन सीटों को विधानसभा में खाली रखा जाएगा।

जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की आवश्यकता:

‘जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम’, 2019 (Jammu and Kashmir Reorganisation Act, 2019) के प्रावधानों के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा पिछले साल 6 मार्च को, केंद्रशासित प्रदेश के लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों को फिर से निर्धारित करने के लिए जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। विदित हो कि, इस अधिनियम के तहत राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया था।

परिसीमन’ क्या होता है?

‘परिसीमन’ (Delimitation) का शाब्दिक अर्थ, ‘विधायी निकाय वाले किसी राज्य में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा निर्धारण प्रक्रिया’ होता है।

परिसीमन प्रक्रिया’ का निष्पादन:

  • परिसीमन प्रक्रिया, एक उच्च अधिकार प्राप्त आयोग द्वारा संपन्न की जाती है। इस आयोग को औपचारिक रूप से परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) या सीमा आयोग (Boundary Commission) कहा जाता है।
  • परिसीमन आयोग के आदेशों को ‘क़ानून के समान’ शक्तियां प्राप्त होती है, और इन्हें किसी भी अदालत के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती है।

आयोग की संरचना:

‘परिसीमन आयोग अधिनियम’, 2002 के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त परिसीमन आयोग में तीन सदस्य होते हैं: जिनमे अध्यक्ष के रूप में उच्चतम न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, तथा पदेन सदस्य के रूप में मुख्य निर्वाचन आयुक्त अथवा इनके द्वारा नामित निर्वाचन आयुक्त एवं राज्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होते है।

संवैधानिक प्रावधान:

  1. संविधान के अनुच्छेद 82 के अंतर्गत, प्रत्येक जनगणना के पश्चात् भारत की संसद द्वारा एक ‘परिसीमन अधिनियम’ क़ानून बनाया जाता है।
  2. अनुच्छेद 170 के तहत, प्रत्येक जनगणना के बाद, परिसीमन अधिनियम के अनुसार राज्यों को भी क्षेत्रीय निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।

 

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप टीकाकरण (Vaccination) और प्रतिरक्षण (Immunisation) के बीच अंतर जानते हैं?  Read here

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. यूरोपीय संघ- संरचना और उद्देश्य।
  2. WHO की आपातकालीन उपयोग सूची (EUL) के बारे में।
  3. लाभ
  4. पात्रता

मेंस लिंक:

WHO की आपातकालीन उपयोग सूची (EUL) पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

केयर्न एनर्जी को भारतीय परिसंपत्तियों पर कब्ज़ा करने का अधिकार


संदर्भ:

ब्रिटेन की ‘केयर्न एनर्जी पीएलसी’ (Cairn Energy Plc) द्वारा एक फ्रांसीसी अदालत से, पेरिस में 20 मिलियन यूरो से अधिक मूल्य की 20 भारतीय सरकारी परिसंपत्तियों को फ्रीज करने का अधिकार दिए जाने संबंधी, आदेश हासिल कर लिया है।

यह, भारत सरकार के खिलाफ ‘पूर्वव्यापी कर कानून’ (retrospective tax law) मामले में  1.2 अरब डॉलर के मध्यस्थता निर्णय को लागू करने वाला पहला अदालती आदेश है। इस निर्णय को

संबंधित प्रकरण:

दिसंबर 2020 में, नीदरलैंड स्थित ‘स्थायी मध्यस्थता न्यायालय’ (Permanent Court of Arbitration -PCA) में तीन सदस्यीय ‘अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थ न्यायाधिकरण’ (International Arbitral Tribunal) द्वारा सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए कहा, कि भारत सरकार द्वारा ‘ब्रिटेन-भारत द्विपक्षीय निवेश संधि’ (India-UK Bilateral Investment Treaty) और ‘निष्पक्ष और न्यायसंगत समाधान की गारंटी’ उल्लंघन किया गया है, और इसकी वजह से ब्रिटिश ऊर्जा कंपनी को नुकसान पहुंचा है।

  • इसके अलावा मध्यस्थ न्यायाधिकरण ने भारत सरकार को ‘केयर्न एनर्जी’ के लिए 2 अरब डॉलर का मुआवजा देने का आदेश दिया था।
  • भारत सरकार ने अभी तक इस मध्यस्थता निर्णय को स्वीकार नहीं किया है। केयर्न एनर्जी इस मुआवजे की वसूली के लिए विदेशों में मौजूद भारतीय परिसंपत्तियों पर कब्ज़ा करने का प्रयास कर रही है।

भारत के पास आगे के लिए उपलब्ध विकल्प:

  • हालांकि, केयर्न एनर्जी के लिए यह पहली सफलता है, किंतु फ्रांसीसी अदालत के इस आदेश ने अन्य न्यायालयों में केयर्न की जीत की संभावना बढ़ा दी है।
  • इन निर्णयों से विदेशों में मौजूद भारतीय परिसंपत्ति कानूनी विवाद में उलझ जाएगी और, भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान उन देशों की सूची में शामिल हो जाएगा, जिनकी परिसंपत्तियां विदेशों में जब्त की जा चुकी हैं।
  • यदि भारत द्वारा अपनी अपील में इन मध्यस्थता निर्णयों को दुर्भावनापूर्ण साबित नहीं किया जाता, तो इन निर्णयों को विदेशी क्षेत्राधिकारों में लागू किया जा सकता है। हालांकि दोनों पक्षों के बीच कोई समझौते भी किया जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि:

भारत सरकार द्वारा ब्रिटेन-भारत द्विपक्षीय निवेश समझौते का हवाला देते हुए वर्ष 2012 में लागू किए गए पूर्वव्यापी कर कानून (retrospective tax law) के तहत आंतरिक व्यापार पुनर्गठन पर करों (taxes) की मांग की गयी थी, जिसे केयर्न एनर्जी ने चुनौती दी थी।

  • वर्ष 2014 में, भारतीय कर विभाग द्वारा कर के रूप में 10,247 करोड़ रुपए ($ 4 बिलियन) की मांग की गयी थी।
  • 2015 में, केयर्न एनर्जी पीएलसी ने भारत सरकार के खिलाफ ‘अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता कार्यवाही’ शुरू कर दी।

‘स्थायी मध्यस्थता न्यायालय’

(Permanent Court of Arbitration – PCA)

  • स्थापना: वर्ष 1899।
  • मुख्यालय: हेग, नीदरलैंड्स।
  • यह एक अंतर सरकारी संगठन है जो विवाद समाधान क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की सेवा करने और देशों के बीच ‘मध्यस्थता’ और विवाद समाधान के अन्य तरीकों की सुविधा प्रदान करने के लिए समर्पित है।
  • इसके सभी निर्णय, जिन्हें ‘अवार्ड’ (Award) कहा जाता है, विवाद में शामिल सभी पक्षों के लिए बाध्यकारी होते हैं और तत्काल लागू किए जाते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

मध्यस्थता (arbitration), मध्यगता या बीचबचाव (mediation) और सुलह (conciliation) एक दूसरे से किस प्रकार भिन्न हैं?  Click here

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘मध्यस्थता’ क्या है?
  2. हालिया संशोधन।
  3. अन्तर्राष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय के बारे में।
  4. भारतीय मध्यस्थता परिषद के बारे में।
  5. 1996 अधिनियम के तहत मध्यस्थों की नियुक्ति।
  6. स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA)- संरचना, कार्य और सदस्य।

मेंस लिंक:

मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) अधिनियम के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

क़ानून तैयार होने तक व्हाट्सएप प्राइवेसी पॉलिसी के क्रियान्वयन पर रोक


संदर्भ:

हाल ही में, व्हाट्सएप ने दिल्ली उच्च न्यायालय को सूचित करते हुए कहा, कि व्हाट्सएप ‘डेटा सुरक्षा विधेयक’ (Data Protection Bill) लागू होने तक उपयोगकर्ताओं को अपनी ‘नई निजता नीति’ (New Privacy Policy) चुनने के लिए बाध्य नहीं करेगा।

संबंधित प्रकरण:

दिल्ली उच्च न्यायालय में, फेसबुक और व्हाट्सएप द्वारा, एकल-न्यायाधीश पीठ के, प्रतिस्पर्धा नियामक ‘भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग’ (Competition Commission of India- CCI) के आदेश पर रोक लगाने से मना करने संबंधी आदेश, के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई की जा रही है। विदित हो कि, ‘भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग’ (CCI) ने व्हाट्सएप की नई निजता नीति की जांच का निर्देश दिया था।

पृष्ठभूमि:

  • व्हाट्सएप द्वारा अपनी मूल कंपनी, फेसबुक के साथ उपभोक्ताओं का डेटा साझा किए जाने संबंधी चिंताओं को लेकर, भारत सहित विश्व स्तर पर उपयोगकर्ताओं द्वारा इसकी कड़ी आलोचना की गयी है।
  • व्हाट्सएप के अनुसार, प्लेटफॉर्म पर भेजे जाने वाले या प्राप्त होने वाले सभी संदेश ‘एंड-टू-एंड’ एन्क्रिप्टेड हैं और व्हाट्सएप के प्लेटफॉर्म पर निजी संदेशों को न तो व्हाट्सएप और न ही फेसबुक देख सकता है।

निजी डेटा संरक्षण विधेयक:

(Personal Data Protection Bill)

  • विचाराधीन निजी डेटा संरक्षण विधेयक का उद्देश्य सरकारी और निजी कंपनियों द्वारा किसी व्यक्ति के डेटा का उपयोग किए जाने को विनियमित करना है।
  • विधेयक में, संस्थाओं को निजी डेटा की सुरक्षा हेतु संरक्षोपाय बनाए रखना तथा डेटा सुरक्षा दायित्वों, पारदर्शिता और जवाबदेही संबंधी उपायों के एक सेट को पूरा करना होगा।
  • विधेयक में उपयोगकर्ताओं को उनके निजी डेटा पर अधिकार और उन अधिकारों का प्रयोग करने का साधन प्रदान करने का प्रावधान किया गया है।
  • विधेयक में, ‘डेटा संरक्षण प्राधिकरण’ (Data Protection AuthorityDPA) नामक एक स्वतंत्र और शक्तिशाली नियामक बनाने का प्रवाधान है। यह ‘डेटा संरक्षण प्राधिकरण’, शासन व्यवस्था का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु डेटा प्रोसेसिंग गतिविधियों की निगरानी और विनियमन करेगा।

निजी डेटा की सुरक्षा हेतु विधेयक लाने की आवश्यकता:

  1. अगस्त 2017 में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक फैसले में कहा गया कि, “निजता, संविधान के अनुच्छेद 21 में उल्लिखित ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार’ के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है।
  2. न्यायालय के अनुसार, निजी डेटा और तथ्यों की गोपनीयता ‘निजता के अधिकार’ का एक अनिवार्य पहलू है।
  3. जुलाई 2017 में, भारत में डेटा संरक्षण से संबंधित विभिन्न मुद्दों की जांच के लिए न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया गया था।
  4. इस समिति द्वारा, जुलाई 2018 में, ‘निजी डेटा संरक्षण विधेयक’ 2018 के मसौदा सहित अपनी रिपोर्ट ‘इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय’ को सौंप दी गई।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप श्रीकृष्ण समिति द्वारा की गयी सिफारिशों के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘निजता का अधिकार’ क्या है?
  2. विधेयक की मुख्य विशेषताएं
  3. ‘व्हाट्सएप की निजता नीति’ के बारे में

मेंस लिंक:

व्हाट्सएप की निजता नीति से संबंधित चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


भूमि पांडुगा

(Bhumi Panduga)

यह आंध्र प्रदेश में कोया जनजाति द्वारा मनाया जाने वाला उत्सव है।

  • यह उत्सव हर साल कृषि कार्यों को शुरू करने के प्रतीक रूप में मनाए जाता है।
  • पुरुषों के लिए, त्योहार के एक भाग के रूप में शिकार करना अनिवार्य होता है। हर शाम एक दावत के दौरान गांव के सभी परिवारों में समान रूप से ‘शिकार’ को वितरित किया जाता है।
  • यह त्यौहार, आमतौर पर जून के महीने में मनाया जाता है।

हिमालयी याक

(Himalayan yaks)

अरुणाचल प्रदेश के पश्चिम कामेंग जिले के दिरांग में स्थित ‘राष्ट्रीय याक अनुसंधान केंद्र’ (National Research Centre on Yak – NRCY)  द्वारा ‘याक’ का बीमा करने के लिये नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (NICL) के साथ एक करार किया है।

  • यह बीमा पॉलिसी याक मालिकों को मौसम की आपदाओं, बीमारियों, आवागमन दुर्घटनाओं, सर्जिकल ऑपरेशनों और हड़तालों या दंगों के जोखिमों से बचाएगी।
  • पॉलिसी के अनुसार, मालिकों को अपने याक के कान पर एक ‘चिह्न’ (Tag) लगाना होगा और अपने पशुओं का बीमा कराने के लिए उनका उचित विवरण देना होगा।

हिमालयन याक के बारे में:

  1. याक अत्यधिक शीत तापमान में रहने के अभ्यस्त होते है और माइनस 40 डिग्री तक का तापमान सहन करने में सक्षम होते हैं।
  2. लद्दाख, सिक्किम और हिमाचल प्रदेश में याक पालन मुख्यतः दो प्रमुख खानाबदोश समुदायों, ‘चांगपा’ और ‘डोकपा’ द्वारा किया जाता है।
  3. वर्तमान में, याक को IUCN द्वारा असुरक्षित (Vulnerable) श्रेणी में रखा गया है।
  4. वर्ष 2012 और 2019 के बीच, देश भर में याकों की संख्या में लगभग 7% की गिरावट आई है।
  5. भारत में याक की आबादी, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड तथा केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख तथा जम्मू-कश्मीर में पाई जाती है।

इंडिया इंडस्ट्रियल लैंड बैंक (IILB)

आईआईएलबी एक जीआईएस- आधारित पोर्टल है जिस पर सभी औद्योगिक बुनियादी ढांचे से संबंधित सूचनाओं की एक ही स्थान पर जानकारी (वन-स्टॉप रिपोजिटरी) – सम्पर्क (कनेक्टिविटी), आधारभूत रचनाओं (इन्फ्रा), प्राकृतिक संसाधन और इलाके, खाली भूखंडों पर प्लॉट-स्तरीय जानकारी, कार्य प्रणाली और संपर्क विवरण उपलब्ध कराए गए हैं।

  • यह दूरस्थ जगहों पर बैठकर भूमि की तलाश करने वाले निवेशकों के लिए ‘निर्णय सहयोग प्रणाली’ के रूप में कार्य करता है।
  • वर्तमान में आईआईएलबी के पास 5 लाख हेक्टेयर भूमि के क्षेत्र में लगभग 4,000 औद्योगिक पार्क हैं।
  • इस प्रणाली को 17 राज्यों के उद्योग आधारित जीआईएस व्यवस्था (सिस्टम) के साथ एकीकृत करके जोड़ दिया गया है ताकि वास्तविक समय के आधार पर इस पोर्टल पर जानकारियों को अद्यतन किया जा सकेI
  • दिसंबर 2021 तक अखिल भारतीय स्तर पर एकीकरण हासिल कर लिया जाएगा।
  • यह ‘उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग’ (DPIIT) के अधीन कार्य करेगा।

 

 

सोशल मीडिया बोल्ड है।

 सोशल मीडिया युवा है।

 सोशल मीडिया पर उठे सवाल सोशल मीडिया एक जवाब से संतुष्ट नहीं है।

 सोशल मीडिया में दिखती है ,

बड़ी तस्वीर सोशल मीडिया हर विवरण में रुचि रखता है।

 सोशल मीडिया उत्सुक है।

 सोशल मीडिया स्वतंत्र है। 

 सोशल मीडिया अपूरणीय है। 

लेकिन कभी अप्रासंगिक नहीं। सोशल मीडिया आप हैं।

 (समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन, जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे, गरीबी और विकासात्मक विषय, शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।

 

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उत्तर प्रदेश सरकार की नई जनसंख्या नीति


संदर्भ:

विश्व जनसंख्या दिवस (11 जुलाई) पर, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2021-2030 की अवधि के लिए एक ‘नई जनसंख्या नीति’ (New Population Policy) की घोषणा की गयी है।

इस नई नीति में, जनसंख्या नियंत्रण में योगदान करने वालों के लिए प्रोत्साहन देने का प्रावधान किया गया है।

जनसंख्या नियंत्रण विधेयक ड्राफ्ट के प्रमुख बिंदु:

नई नीति का उद्देश्य-

  1. कुल प्रजनन दर को, वर्तमान में प्रति हजार आबादी पर 2.7 से घटाकर वर्ष 2026 तक 2.1 और वर्ष 2030 तक 1.7 करना है।
  2. आधुनिक गर्भनिरोधक प्रचलन दर को, वर्तमान में 31.7% से बढ़ाकर वर्ष 2026 तक 45% और वर्ष 2030 तक 52% करना है।
  3. पुरुषों द्वारा उपयोग किए जाने वाले गर्भनिरोधक तरीकों को, वर्तमान में 10.8% से बढ़ाकर वर्ष 2026 तक 15.1% और वर्ष 2030 तक 16.4% करना है।
  4. मातृ मृत्यु दर को 197 से घटाकर 150 से 98 तक और शिशु मृत्यु दर को 43 से घटाकर 32 से 22 तक और पांच वर्ष से कम आयु के शिशुओं की मृत्यु दर को 47 से घटाकर 35 से 25 तक लाना है।

नीति के तहत केंद्रीय क्षेत्र:

  1. परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत जारी गर्भनिरोधक उपायों की सुलभता को बढ़ाना और सुरक्षित गर्भपात के लिए उचित व्यवस्था उपलब्ध कराना।
  2. नवजात शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर को कम करना।
  3. बुजुर्गों की देखभाल और 11 से 19 साल के किशोरों की शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के बेहतर प्रबंधन की व्यवस्था करना।

नीति के तहत प्रोत्साहन:

  1. जनसंख्या नियंत्रण मानदंडों का पालन करने वाले तथा दो या इससे कम बच्चों वाले कर्मचारियों को पदोन्नति, वेतन वृद्धि, आवास योजनाओं में रियायतें और अन्य सुविधाएं प्रदान की जाएंगी।
  2. दो बच्चे के मानक को पूरा करने वाले लोक सेवकों को उनकी पूरी सेवा के दौरान दो अतिरिक्त वेतन वृद्धि, पूरे वेतन और भत्तों सहित 12 महीने का पितृत्व या मातृत्व अवकाश और ‘राष्ट्रीय पेंशन योजना’ के अंतर्गत, नियोक्ता की योगदान राशि में तीन प्रतिशत की वृद्धि प्रदान की जाएगी।
  3. जनसंख्या को नियंत्रण में योगदान करने वाले गैर-सरकारी कर्मचारियों को जल, आवास, गृह ऋण आदि पर करों में छूट जैसे लाभ दिए जाएंगे।
  4. यदि किसी बच्चे के माता-पिता द्वारा पुरुष नसबंदी का विकल्प चुनते हैं, तो उस बच्चे के लिए 20 वर्ष की आयु तक मुफ्त चिकित्सा सुविधाएँ प्रदान की जाएंगी।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा, इन उपायों को लागू करने के लिए एक ‘राज्य जनसंख्या कोष’ (State Population Fund) स्थापित करने की योजना है।

जागरूकता निर्माण:

विधेयक के मसौदा में, राज्य सरकार से सभी माध्यमिक विद्यालयों में जनसंख्या नियंत्रण को अनिवार्य विषय के रूप में शुरू करने के लिए कहा गया है।

प्रयोज्यता:

  1. इस कानून के प्रावधान विवाहित जोड़ों पर लागू होंगे। विवाहित युग्म में पुरुष की न्यूनतम आयु 21 साल तथा महिला की आयु 18 साल से कम नहीं होनी चाहिए है।
  2. यह नीति स्वैच्छिक होगी – इसे किसी पर जबरदस्ती लागू नहीं किया जाएगा।

इन उपायों की आवश्यकता:

अधिक जनसंख्या से उपलब्ध संसाधनों पर ज्यादा दबाव पड़ता है। अतः, सभी नागरिकों को, सस्ता एवं पौष्टिक भोजन, सुरक्षित पेयजल, उपयुक्त आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच, आर्थिक एवं आजीविका हेतु अवसर, घरेलू उपभोग हेतु बिजली और सुरक्षित जीवन सहित मानव जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की उपलब्धता सुलभ होने के लिए ये उपाय अविलंब लागू करना आवश्यक है।

विधेयक से जुड़े मुद्दे और चिंताएं:

  1. विशेषज्ञों द्वारा, महिलाओं के स्वास्थ्य और कल्याण को संकट में डालने वाली किसी भी जनसंख्या नीति के प्रति सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।
  2. गर्भनिरोधक और परिवार नियोजन का बोझ महिलाओं पर असमान रूप से पड़ता है, इसे देखते हुए, इस नीति के लागू होने से महिला नसबंदी में और वृद्धि होने की संभावना है।
  3. भारत में पुत्र को दी जाने वाली वरीयता को देखते हुए, कड़े जनसंख्या नियंत्रण उपायों से असुरक्षित गर्भपात एवं भ्रूण हत्याओं जैसी प्रथाओं में वृद्धि हो सकती है। इस तरह के उदाहरण, अतीत में कुछ राज्यों में देखे जा चुके हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि लगभग 220 मिलियन की आबादी सहित उत्तर प्रदेश, भारत का सर्वाधिक आबादी वाला राज्य है? देश की जनसंख्या की वृद्धि दर को समझने के लिए पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मसौदे के प्रमुख बिंदु
  2. नवीनतम जनगणना आंकड़े

मेंस लिंक:

उत्तर प्रदेश में ‘जनसंख्या नीति’ मसौदा से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का निर्वाचन


संदर्भ:

महाराष्ट्र राज्य की विधानसभा में ‘अध्यक्ष’ का पद इस वर्ष फरवरी माह से रिक्त है, और विधानसभा सत्र की अध्यक्षता, उपाध्यक्ष द्वारा की जा रही है।

यहां तक ​​कि, लोकसभा और कई राज्यों की विधानसभाओं में भी उपाध्यक्ष / डिप्टी स्पीकर (Deputy Speaker) के पद रिक्त हैं।

सदन के अध्यक्ष एव उपाध्यक्ष पद हेतु निर्वाचन प्रक्रिया

संविधान के अनुच्छेद 93 में लोकसभा और अनुच्छेद 178 में राज्य विधानसभाओं के संदर्भ में किए गए प्रावधानों के अनुसार, “सदन, यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अपने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में चुनेंगे।

  • लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में, अध्यक्ष (Speaker) का चुनाव करने हेतु राष्ट्रपति / राज्यपाल द्वारा एक तिथि निर्धारित की जाती है, इसके पश्चात निर्वाचित अध्यक्ष, उपाध्यक्ष का चुनाव करने हेतु तारीख तय करता है।
  • संबंधित सदनों के सांसद / विधायक, इन पदों पर सदन के सदस्यों में से किसी एक का निर्वाचन करने हेतु मतदान करते हैं।

सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष की भूमिकाएं और कार्य:

  • अध्यक्ष, “सदन का प्रमुख प्रवक्ता होता है, और सदन का सामूहिक रूप से प्रतिनिधित्व करता है। वह शेष विश्व के लिए सदन का एकमात्र प्रतिनिधि होता है”।
  • अध्यक्ष, सदन की कार्यवाही और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों की अध्यक्षता करता है।
  • अध्यक्ष, किसी विधेयक के, ‘धन विधेयक’ होने अथवा न होने संबंधी और इसके ‘धन विधेयक’ होने पर दूसरे सदन के अधिकार-क्षेत्र से बाहर होने संबंधी निर्णय करता है।
  • आमतौर पर, अध्यक्ष को सत्ताधारी दल से चुना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के दौरान, लोकसभा उपाध्यक्ष के मामले में यह स्थिति भिन्न रही है।
  • संविधान में ‘लोकसभा अध्यक्ष’ की स्वतंत्रता व निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु, इसका वेतन ‘भारत की संचित निधि’ पर भारित किया गया है, और इस पर संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है।
  • किसी विधेयक पर बहस या सामान्य चर्चा के दौरान संसद सदस्यों द्वारा केवल ‘अध्यक्ष’ को ही संबोधित किया जाता है।

चुनाव कराने हेतु समय-सीमा निर्दिष्ट करने वाले राज्य:

संविधान में ‘सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष’ हेतु चुनावों के लिए कोई प्रक्रिया या समय सीमा निर्धारित नहीं की गयी है। इन पदों पर चुनाव आयोजित करने संबंधी निर्णय लेने का दायित्व विधायिकाओं पर छोड़ दिया गया है।

उदाहरण के लिए, हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों में ‘अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष’ पदों के निर्वाचन हेतु एक समय-सीमा निर्दिष्ट की गयी है।

हरियाणा:

  1. हरियाणा में विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव, आम चुनाव संपन्न के पश्चात शीघ्रातिशीघ्र किया जाता है। और फिर, इसके सात दिनों के भीतर उपाध्यक्ष का चुनाव किया जाता है।
  2. निर्धारित नियमों के अनुसार, इन पदों में से कोई पद रिक्त होने पर, विधायिका के अगले सत्र में पहले सात दिनों के भीतर इसके लिए चुनाव किया जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश:

  1. विधानसभा की अवधि के दौरान यदि किसी कारणवश ‘अध्यक्ष’ का पद रिक्त हो जाता है, तो इस पद के हेतु, पद-रिक्त होने की तिथि से 15 दिन के भीतर चुनाव करने हेतु समय सीमा निर्धारित की गई है।
  2. ‘उपाध्यक्ष’ पद के मामले में, पहली बार चुनाव की तारीख ‘अध्यक्ष’ द्वारा तय की जाती है, और इसके बाद में हुई की रिक्तियों को भरने हेतु चुनाव के लिए 30 दिन का समय दिया जाता है।

लोकसभा अध्यक्ष की भूमिकाओं और कार्यों के बारे में अधिक जानने हेतु देखें

 

इंस्टा जिज्ञासु:

  • क्या आप जानते हैं कि उपसभापति, सभापति के अधीनस्थ नहीं होता है, वह राज्यसभा के प्रति सीधे उत्तरदायी होता है, क्योंकि दोनों का चुनाव सदन के सदस्यों में से किया जाता है? यहां पढ़ें
  • क्या आप जानते हैं कि अध्यक्ष की अनुपस्थिति में लोकसभा की कार्यवाही की अध्यक्षता करने हेतु 10 सदस्यों का एक पैनल गठित किया जाता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव।
  2. कार्य
  3. शक्तियां
  4. पद-त्याग
  5. पद-मुक्ति के लिए आधार
  6. लोकसभा अध्यक्ष और संबंधित समितियां

मेंस लिंक:

लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका एवं कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

राइट-टू-रिपेयर’ आंदोलन


(‘Right to Repair’ Movement)

इस आंदोलन के बारे में:

‘राइट-टू-रिपेयर’ (Right to Repair) अर्थात ‘मरम्मत करने का अधिकार’, उपभोक्ताओं को अपने इलेक्ट्रॉनिक्स तथा अन्य उत्पादों की मरम्मत खुद करने हेतु सक्षम बनाता है।

  • इस आंदोलन का लक्ष्य, कंपनियों द्वारा इलेक्ट्रॉनिक्स तथा अन्य उत्पादों के स्पेयर पार्ट्स, औजार तथा इनको ठीक करने हेतु उपभोक्ताओं और मरम्मत करने वाली दुकानों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध करवाना है, जिससे इन उत्पादों का जीवन-काल बढ़ सके और इन्हें कचरे में जाने से बचाया जा सके।
  • इस आंदोलन की जड़ें 1950 के दशक में कंप्यूटर युग की शुरुआत से जुडी हुई हैं।

आंदोलन की शुरुआत के कारण एवं उद्देश्य:

इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के निर्माताओं द्वारा ‘एक नियोजित अप्रचलन’ (Planned Obsolescence) की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जा रहा है – जिसका अर्थ है कि उपकरणों को विशेष रूप से सीमित समय तक काम करने और इसके बाद इन्हें बदले जाने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।

  • इससे पर्यावरण पर अत्यधिक दबाव पड़ता है और प्राकृतिक संसाधनों का अपव्यय होता है।
  • इसके अलावा, उपभोक्ताओं को अक्सर उत्पाद निर्माताओं की मेहरबानी पर छोड़ दिया जाता है, और ये उत्पाद निर्माता यह निर्धारित करते हैं कि इन उपकरणों को कौन ठीक कर सकता है।
  • इस प्रकार अधिकाँश लोगों के लिए उपकरणों की मरम्मत करवाना काफी महंगा और कठिन हो जाता है।

‘राइट-टू-रिपेयर’ के लाभ:

मरम्मत करने वाली छोटी दुकानें स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का एक महत्वपूर्ण भाग होती हैं, इस अधिकार को दिए जाने से इन दुकानों के कारोबार में वृद्धि होगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभ होगा।

विभिन्न देशों में ‘राइट-टू-रिपेयर’ कानून:

हालिया वर्षों में, विश्व के तमाम देशों में, एक प्रभावी ‘राइट-टू-रिपेयर’ कानून को पारित करने का प्रयास किया जा रहा है।

  • अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन द्वारा, हाल ही में, एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस आदेश में ‘फ़ेडरल ट्रेड कमीशन’ से, उपभोक्ताओं के अपनी शर्तों पर अपने उपकरण की मरम्मत करने पर निर्माताओं द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों पर लगाम लगाने के लिए कहा गया है।
  • ब्रिटेन में ‘राइट-टू-रिपेयर’ नियम लागू किए गए हैं, जिनके तहत, टीवी और वाशिंग मशीन जैसे दैनिक उपयोग के उपकरणों को खरीदना और उनकी मरम्मत करना काफी आसान हो जाएगा।

आंदोलन का विरोध:

इस आंदोलन को पिछले कुछ वर्षों में एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट जैसे तकनीकी दिग्गजों के जबरदस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है।

  • इनका तर्क यह है कि, अपनी बौद्धिक संपदा को, तीसरे पक्ष की मरम्मत सेवाओं या शौकिया मरम्मत करने वालों के लिए खोलने से उनका शोषण हो सकता है और उनके उपकरणों की विश्वसनीयता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
  • इन कंपनियों द्वारा यह तर्क भी दिया जाता है कि, इस तरह की पहल से डेटा सुरक्षा और साइबर सुरक्षा को खतरा हो सकताहै।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप मोबाइल फोन पार्टनरशिप इनिशिएटिव (MPPI) के बारे में जानते हैं? MPPI को बेसल अभिसमय (Basel Convention) के पक्षकार सम्मलेन की छठी बैठक में अपनाया गया था। इस बारे में अधिक जानने हेतु पढ़ें

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

वीएसएस यूनिटी स्पेसशिप की सबऑर्बिटल फ्लाइट


संदर्भ:

हाल ही में ‘वीएसएस यूनिटी स्पेसशिप’ (VSS Unity spaceship) ने न्यू मैक्सिको से उड़ान भरकर पृथ्वी से 85 किमी की ऊंचाई तक की यात्रा की और सकुशल पृथ्वी पर वापस लौट आया। इस अंतरिक्ष यान में छह लोग सवार थे। इस तरह की यात्रा को “उपकक्षीय उड़ान” या ‘सबऑर्बिटल फ्लाइट’ (Suborbital Flight) कहा जाता है।

सबऑर्बिटल’ क्या है?

पृथ्वी की परिक्रमा करने हेतु उपग्रहों को एक निश्चित गति सीमा हासिल करनी होती हैं। यदि कोई पिंड लगभग 28,000 किमी/घंटा या इससे अधिक की क्षैतिज गति से यात्रा करता है, तो वह पिंड वायुमंडल पार करते हुए कक्षा में पहुँच जाता है।

  • इस गति पर कोई उपग्रह, गुरुत्वाकर्षण की वजह से पृथ्वी की ओर गति नहीं कर पाता है।
  • इस प्रकार की यात्रा में, अंतरिक्ष यात्रियों को कुछ पलों तक “भारहीनता” का अनुभव होता है।

इस प्रकार के प्रयोगों का महत्व:

  • ‘उपकक्षीय उड़ानें’ या ‘सबऑर्बिटल फ्लाइट’, माइक्रोग्रेविटी (सूक्ष्म-गुरुत्व) के विषय में शोध करने हेतु सहायक होती हैं।
  • ये उड़ाने, अंतिरक्ष में प्रयोग करने और लोगों को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक ले जाने की तुलना में काफी सस्ती होती है।
  • सबऑर्बिटल फ्लाइट्स, ​​​​वर्तमान में अंतरिक्ष एजेंसियों द्वारा शून्य गुरुत्वाकर्षण की नक़ल करने (simulate) हेतु उपयोग की जाने वाली वायुयानों की ‘परवलयिक उड़ानों’ (Parabolic Flights) का एक विकल्प भी हो सकती हैं।

‘यूनिटी 22’ मिशन के बारे में:

‘यूनिटी 22’ मिशन के एक भाग के रूप में, ‘वर्जिन गेलेक्टिक’ द्वारा विकसित ‘यूनिटी’ रॉकेट यान पर सवार चालक दल सुदूर अंतरिक्ष में उड़ान भरेगा।

  • यह ‘वीएसएस यूनिटी’ का 22वां मिशन होगा।
  • यह ‘वर्जिन गेलेक्टिक’ की चालक दल सहित चौथी अंतरिक्ष उड़ान होगी।
  • इस मिशन में वर्जिन ग्रुप के संस्थापक रिचर्ड ब्रैनसन सहित दो पायलटों और चार मिशन विशेषज्ञों का दल अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे। रिचर्ड ब्रैनसन, निजी तौर पर अंतरिक्ष यात्री का अनुभव प्राप्त करेंगे।

मिशन के उद्देश्य:

  • ‘यूनिटी 22’ केबिन और ग्राहकों के अनुभव परीक्षण पर ध्यान केंद्रित करेगा।
  • वर्तमान में, वर्जिन गेलेक्टिक द्वारा वर्ष 2022 में वाणिज्यिक सेवा शुरू करने की योजना से पहले, दो अतिरिक्त परीक्षण उड़ाने अंतरिक्ष में भेजी जाएंगी।

भारत के लिए महत्व:

भारत में जन्मी अंतरिक्ष यात्री ‘सिरिशा बांडला’ (Sirisha Bandla) ‘यूनिटी 22’ मिशन के चालक दल का हिस्सा होंगी।

  • वह, कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स के बाद अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की तीसरी महिला होंगी।
  • ‘सिरिशा बांडला’ से पहले अंतरिक्ष में जाने वाले एक अन्य भारतीय ‘राकेश शर्मा’ थे।

वीएसएस यूनिटी अंतरिक्षयान की विशिष्टता:

वर्जिन गेलेक्टिक के सबऑर्बिटल अंतरिक्ष यान को ‘व्हाइट नाइट टू’ (White Knight Two) नामक एक कैरीअर एयरक्राफ्ट की तली से हवा में प्रक्षेपित किया गया है। यह अंतरिक्ष यान लगभग 90 किलोमीटर की ऊँचाई तक उड़ान भर सकता है। यह दूरी, यात्रियों को कुछ मिनट तक भारहीनता का अनुभव और अंतरिक्ष से पृथ्वी की गोलाई / वक्रता का दर्शन कराने के लिए पर्याप्त है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

  1. क्या आपने पर्यटकों को अंतरिक्ष में ले जाने वाले ‘न्यू शेफर्ड’ नामक रॉकेट सिस्टम के बारे में सुना? इसके बारे में जानने हेतु पढ़िए
  2. किस ऊंचाई को ‘अंतरिक्ष का किनारा’ (Edge of Space) माना जाता है? क्रेमन लाइन’ (Karman line) कहाँ है? इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए पढ़ें।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘यूनिटी 22’ मिशन के बारे में
  2. उद्देश्य
  3. इसी प्रकार के अन्य मिशन

मेंस लिंक:

‘यूनिटी 22’ मिशन के महत्व पर चर्चा करें।

स्रोत: द हिंदू।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय:  सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नासा का वाईपर मिशन


(NASA’s VIPER Mission)

संदर्भ:

हाल ही में, नासा ने वर्ष 2023 में, ‘वोलाटाइल्स इंवेस्टिगेटिंग पोलर एक्सप्लोरेशन रोवर ‘(Volatiles Investigating Polar Exploration Rover– VIPER) / वाईपर मिशन लांच करने की घोषणा की है।

नासा द्वारा इस मिशन को शुरू करने का उद्देश्य यह पता करना है, कि क्या चंद्रमा पर स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए वहां मानव जीवन संभव हो सकता है?

About the mission:

मिशन के बारे में:

  • VIPER एक मोबाइल रोबोट है।
  • यह किसी अन्य खगोलीय पिंड पर, उसके संसाधनों का मानचित्रण करने हेतु भेजा जाने वाला पहला मिशन है।
  • नासा की वाणिज्यिक लूनर पेलोड सर्विसेज (Commercial Lunar Payload Services – CLPS) 100 दिनों के इस मिशन के लिए प्रक्षेपण वाहन और लैंडर उपलब्ध कराएगी।

मिशन के उद्देश्य:

  1. चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र का अन्वेषण करना।
  2. चंद्रमा पर उपलब्ध संसाधनों का मानचित्र बनाने में सहायता करना।
  3. पानी की सांद्रता के साथ-साथ चंद्रमा की सतह पर अन्य संभावित संसाधनों का आंकलन करना।

मिशन का महत्व:

VIPER के निष्कर्षों से “आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत भविष्य में लैंडिंग साइटों के लिए, उन जगहों का निर्धारण करने में मदद मिलेगी, जहाँ पर अंतरिक्ष यात्रिओं के लिए, उनके प्रवास के दौरान पानी और अन्य जीवन के लिए आवश्यक संसाधनों का उपयोग किया जा सके।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप वर्ष 2028 तक चंद्रमा की सतह पर एक मानव की स्थायी मौजूदगी दर्ज करने हेतु नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम के बारे में जानते है?

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

फ्लेक्स-फ्यूलवाहनों हेतु दिशा-निर्देश जारी करेगी सरकार


संदर्भ:

केंद्र सरकार द्वारा अक्टूबर तक, फ्लेक्स इंजनों (flex engines) का उपयोग करने वाले ‘फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल्स’ (flexible fuel vehicles FFVs) के उपयोग हेतु नए दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे।

इन दिशा-निर्देशों में, मिश्रित ईंधन के अनुरूप इंजन की बनावट और वाहनों में आवश्यक अन्य परिवर्तनों को निर्दिष्ट किया जाएगा।

‘फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल’ (FFVs) के बारे में:

FFV वाहनों का एक संशोधित प्रारूप है, जो विभिन्न स्तर के इथेनॉल मिश्रण सहित गैसोलीन और मिश्रित पेट्रोल दोनों पर चल सकते हैं।

  • ‘फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल’, सभी प्रकार के मिश्रित ईधनों का उपयोग करने और बिना मिश्रित ईंधन, दोनों पर चलने में सक्षम होंगे।
  • FFV में 84 प्रतिशत से अधिक इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पर चलने में सक्षम इंजन लगा होता है।

लाभ:

  • ‘फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल’ (FFVs) का उद्देश्य प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधन के उपयोग को कम करना और हानिकारक उत्सर्जन को कम करना है।
  • वर्तमान में वैकल्पिक ईंधन, इथेनॉल, के कीमत 60-62 रुपये प्रति लीटर है, जबकि पेट्रोल की कीमत देश के कई हिस्सों में 100 रुपये प्रति लीटर से अधिक है। अतः इसलिए इथेनॉल का उपयोग करने से भारतीयों को 30-35 रुपये प्रति लीटर की बचत होगी।
  • भारत में, FFVs का एक अन्य विशेष लाभ होगा, क्योंकि ये वाहनों को, देश के विभिन्न हिस्सों में उपलब्ध इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के विभिन्न मिश्रणों का उपयोग करने में सक्षम करेगा।
  • इसके अलावा, ये वाहन जनवरी 2003 में केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम का तार्किक विस्तार हैं।
  • चूंकि भारत में मक्का, चीनी और गेहूं का उत्पादन अधिशेष मात्रा में होता है, इसलिए इथेनॉल कार्यक्रम के अनिवार्य सम्मिश्रण से किसानों को उच्च आय हासिल होने में मदद मिलेगी।
  • चूंकि, भारत में कच्चे तेल की 80 प्रतिशत से अधिक आवश्यकताओं को आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है, अतः समग्र भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए, इथेनॉल का अधिक उपयोग से ऑटोमोबाइल ईंधन के आयात पर होने वाली लागत बचाने में मदद मिलेगी।

FFVs उपयोग करने के नुकसान/चुनौतियाँ:

  • ग्राहकों की स्वीकृति (Customer acceptance) एक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि इन वाहनों को खरीदना और इनको चलाने की लागत, 100 प्रतिशत पेट्रोल वाहनों की तुलना में बहुत अधिक होने वाली है।
  • 100 प्रतिशत इथेनॉल (E100) के साथ वाहन चलाने पर, इसकी लागत (कम ईंधन दक्षता के कारण) 30 प्रतिशत से अधिक हो जाएगी।
  • फ्लेक्स फ्यूल इंजन की कीमत अधिक होती है क्योंकि इथेनॉल में, पेट्रोल की तुलना में बहुत भिन्न रासायनिक गुण होते हैं। इथेनॉल का ऊष्मीय मान / Calorific value (40 प्रतिशत), गैसोलीन की तुलना में काफी कम, तथा वाष्पीकरण की ‘गुप्त ऊष्मा’ काफी उच्च होती है।
  • इथेनॉल, एक विलायक के रूप में भी कार्य करता है और इंजन के अंदर की सुरक्षात्मक तेल परत को नष्ट कर सकता है जिससे इंजन में टूट-फूट हो सकती है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2022 तक पेट्रोल में 10 फीसदी एथेनॉल ब्लेंडिंग और वर्ष 2030 तक 20 फीसदी मिश्रण का लक्ष्य रखा गया है? हालांकि, हाल ही में इस लक्ष्य को संशोधित करके वर्ष 2025 कर दिया गया है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘फ्लेक्सिबल फ्यूल व्हीकल’ (FFVs) के बारे में
  2. इथेनॉल क्या है?
  3. इथेनॉल सम्मिश्रण के बारे में

मेंस लिंक:

पारंपरिक ईंधन के साथ एथेनॉल सम्मिश्रण किए जाने वाले लाभों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


लेमरू हाथी अभ्यारण्य

(Lemru Elephant Reserve)

लेमरू हाथी अभ्यारण्य, छत्तीसगढ़ में स्थापित किया जाएगा।

  • इसे वर्ष 2005 में प्रस्तावित किया गया था और वर्ष 2007 में केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदन प्रदान किया गया।
  • इस क्षेत्र में हाथियों के ओडिशा और झारखंड से छत्तीसगढ़ की ओर जाने पर होने वाले ‘मानव-वन्यजीव संघर्ष’ को रोकने के लिए यह योजना बनाई गई है।

चर्चा का कारण:

सरकार द्वारा प्रस्तावित रिजर्व के क्षेत्र को 1,995 वर्ग किमी से घटाकर 450 वर्ग किमी करने की योजना बनाई जा रही है, इस वजह से लेमरू हाथी अभ्यारण्य पर विवाद उत्पन्न हो गया है।

  • सरकार का कहना है कि, यदि प्रस्तावित रिजर्व के क्षेत्र को कम नहीं किए गया तो, इसमें स्थित कई कोयला खदानें अनुपयोगी हो जाएंगी।
  • रिजर्व के तहत प्रस्तावित क्षेत्र, हसदेव अरण्य जंगलों के अंतर्गत आता है, जोकि समृद्ध जैवविविधता के साथ-साथ कोयले के भंडार में भी समृद्ध है।

ब्रायम भारतीएंसिस

(Bryum bharatiensis)

हाल ही में, भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा अंटार्कटिका में ‘काई’ (Moss) की एक देशी प्रजाति की खोज की है।

  • भारत और भारतीय अंटार्कटिक स्टेशन ‘भारती’ के नाम पर इस प्रजाति का नाम ‘ब्रायम भारतीएंसिस’ (Bryum bharatiensis) रखा गया है।
  • यह, भारतीय अंटार्कटिक मिशन के चार दशकों में खोज की गई पहली पादप प्रजाति है।..

 

सोशल मीडिया बोल्ड है।

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लेकिन कभी अप्रासंगिक नहीं। सोशल मीडिया आप हैं।

 (समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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